मोहब्बत….

ये सफ़र मोहब्बत का बड़ा ही सुहाना है

ना इसकी कोई मंजिल,ना कोई बहाना है

मोहब्बत करो तो, हौसला रखो यारों,

ये दरिया है आग का, और पार भी पाना है

क्यों करते हैं मोहब्बत में, शोर-शराबा आशिक़

यह फ़साना तो, निगाहों में बयां होता है

जिसमें वादे टूटे, साथी छूटे, तो वह मोहब्बत कैसी

ग़र फ़ाज़िल प्यार में हम हो जायें,

तो हमसफ़र में ही खुदा होता है।।

(फ़ाज़िल= सच्चरित्र)

#मन घुमक्कड़

दोस्त….

बिन सच्चे दोस्त, सब जीवन सूना
जिनसे सांझा कर सुखदुःख, हम राहें बुनते
हर रिश्ता हमको मिलता, बना बनाया
सिर्फ दोस्त ही है जीवन में, जिसे हम ख़ुद ही चुनते…..
#मन घुमक्कड़

यारों के दिल की….

साथ चले थे सफ़र में कुछ यार झूम के..
मंजिलें आती गयीं और यार कम होते गए
इस भागदौड़ की जिंदगी में, कुछ पल अपने हम भी चुरायें
आओ दोस्तों फिर एकबार, फूल दोस्ती का हम खिलायें
सभी ने मंजिल तो पाई है,फिर न जाने कैसी एक तन्हाई है
दिल कहता है कि काश फिर वह सफ़र शुरू हो पाये
आओ दोस्तों फिर एकबार, फूल दोस्ती का हम खिलायें
सब पुराने यार मिलें और वापस पीछे जायें
यादें जो वृद्ध हो चली,फिर से उनको जवां कर आयें
आओ दोस्तों फिर एकबार, फूल दोस्ती का हम खिलायें
फिर यारों की महफ़िल जमें, कुछ क़िस्से फिर से गुदगुदाए
बैठ चौकड़ी मार, कुछ उनकी सुनें कुछ अपनी सुनाएं
आओ दोस्तों फिर एकबार, फूल दोस्ती का हम खिलायें
जिन जगहों के पल थे प्यारे, वापस उन जगहों मे जायें
ट्रिपल सीट बैठकर सड़कों पर, फिर से आओ धूम मचायें
आओ दोस्तों फिर एकबार, फूल दोस्ती का हम खिलायें
सफलता के लिए जहाँ नाक थी रगड़ी, फिर से उसी मंदिर जायें
उसी चाय ठेले की रेलिंग से, मामा स्पेशलचाय चिल्लाए
आओ दोस्तों फिर एकबार, फूल दोस्ती का हम खिलायें
न जाने कल क्या हो जायें, हो सकता है हम मिल न पायें
माना व्यस्थता बहुत है सबकी, क्यों एक प्रयत्न किया जायें
आओ दोस्तों फिर एकबार, फूल दोस्ती का हम खिलायें
बच्चे भी अब बड़े हो चले, क्यों न हम भी बच्चे बन जायें
बुढ़ापे में लाफिंग क्लब में न रहें, चलो ऐसी युक्ति कर आयें
आओ दोस्तों फिर एकबार, फूल दोस्ती का हम खिलायें
#मन घुमक्कड़

ज़मीर..

तू चाहे जितना गरीब हो या अमीर हो
पर ज़रूरी तो तेरे अंदर तेरा ज़िंदा ज़मीर हो…

#मन घुमक्कड़

क्वालिटी टाइम…

नदियाँ उज्जवल, पर्वत उज्जवल,
उज्जवल यह धरा हो गयी
इंसान क्या कैद हुए घरों में
पावन ये हवा हो गयी….
इस लॉक डाउन ने रिश्तों के मायने सिखाये हैं
कुछ रिश्ते फिर पास आये, कुछ ने झगड़े बढ़ाये हैं
फिर एक बाप बेटी संग खेला,एक बेटे ने दाल बनाई है
कहीं पति ख़ानसामा बना, कहीं पत्नी गीत सुनाई है
कोई घर मे डांस सीख रहा, कोई कागज़ में तस्वीर उकेरे है
कहीं रोज नए व्यंजनों के मजे, कहीं रोटी के फ़ेरे हैं
कहीं बूढ़े माँ बाप की शुभ घड़ी आ गयी
जब बहुबेटे के रूप में उनकी छड़ी आ गयी
अंताक्षरी में लोगो की सुबह से शाम हो गयी
दोस्तों रिश्तेदारों में वीडियोकॉल भी अब आम हो गयी
फिर घर की खुशहाली में रहकर हम क्यों हो रहे बोर
वहीं दुःख सहकार इस सुख को पाने, मजदूर लगा रहा ज़ोर
#मन घुमक्कड़