बदलते रिश्ते..

जो हर बात पे याद किया करते थे,
याद आने पे अब बात नही करते हैं।
ये रिश्ते बहुत नाज़ुक है जीवन के,
टूटने पे आवाज़ नही करते हैं….

#मन घुमक्कड़

सर्द हवाएं…

धूप में बैठे
या घर में कैद रहे
सर्द हवाएं तुम्हारी यादों की तरह
हर जगह पहुँच जाती है…….

#मन घुमक्कड़

अस्मत…..


दरिंदे अस्मत तार करें
सियासत बैठ विचार करें


मन को कुचल शरीर पे टूटे
एक गुड़िया के सारे सपने छूटे
जीवन से वह हार गई
लड़ते लड़ते स्वर्ग सिधार गयी
चाहे बेटी रोज मरे
पर सियासत बैठ विचार करें…


दरिंदे अस्मत तार करें
सियासत बैठ विचार करें


शर्म भी अब तो शर्माए
महिलाएं बेपरवाह कब जी पाए
हर काठ पे उल्लू बैठे है
कैसे खुद को बचा पाए
अब खुद ही दुर्गा बन इन
दुर्जनों का संहार करें
क्योकि सियासत बैठ विचार करें


दरिंदे अस्मत तार करें
सियासत बैठ विचार करें


सारी उम्र लड़कियों को ही समझाते
लड़कों को क्यों नहीं देते ज्ञान..
कि पौरुष तेरा नारी की रक्षा में है
न भक्षक तू बन जाना
अगर पिया है दूध माँ का,
तो नारी को कभी न लजाना
हर माँ, अब बच्चे के कानों में
बचपन से यह बात भरे..
क्योकि सियासत तो बैठ विचार करें


दरिंदे अस्मत तार करें
सियासत बैठ विचार करें

एक कसक, एक दहशत,
में जी रही ये बेटियां,
घर मे है पाबंदी,
बाहर ताने सहती बेटियां
दरिंदो की टोली से,
अस्मत बचाने लड़ती बेटियां
है कठिन जीवन फिर भी
आगे बढ़ती बेटियां
न्याय करो बस न्याय करो
हर बेटी यही फ़रियाद करें
यू दरिंदे न अस्मत तार करें
पर सियासत बैठ विचार करें


दरिंदे अस्मत तार करें
सियासत बैठ विचार करें

#मन घुमक्कड़

नारी…

धरती का वरदान है नारी
मानव जीवन की शान है नारी
विभिन्न रूपों में मिलती जग को
एक ऐसा सम्मान है नारी

बहुत सहनशीलता इनके अंदर
मन जैसे हो समन्दर
मानव जीवन को चमकाने
देवत्व गुणों की खान है नारी

परिवार, देश, बच्चों की ख़ातिर
आ जाये कोई मुश्किल तो
रहकर अडिग राहों में
खुद का करती बलिदान है नारी

तेरे जन्म पर कोई रूठे
और कोई खुशी मनाये
दुःख सहकर, खुश रखती सबको
ऐसा अद्‌भुत त्याग है नारी

बाबुल की बगिया महकाके
अलग बाग का फूल बन जाती
मात पिता की ख़ातिर अपना 
करती सर्वत्र न्यौछावर नारी

क़ाबिल बनकर फ़र्ज निभाती
कर्त्तव्य पथ पर बढ़ते जाती
चाहे जो हो विपदा देश मे 
करती सदा योगदान है नारी

कभी बेटी, कभी प्यारी माता 
बहन बन, भाई से नाता 
पत्नी बन, सही बात बताती
घर सवार लक्ष्मी कहलाती
हर सुख में वह, हर दुःख में वह
हर रूपों में, जीवन महकाने
फूलों सी, मुस्कान है नारी

घर, बाहर, कुछ डरी हुई सी
ज़िंदा है, पर मरी हुई सी
वक़्त नया हो या हो पुराना
अक़्सर क्यूँ है, छलि हुई सी

नारी का अपमान करे वो
आबरू को नीलाम करे वो
अपनी शक्ति उन्हें दिखाकर
पौरुष का गुणगान करे वो

गर रक्त में तेरे संचार नही
नारी रक्षा का विचार नही
पहन चूड़ियां बैठ जा घर में
तुझे मर्द होने का अधिकार नही

सिर्फ चाहती साथ तुम्हारा
दे दो ग़र तुम उन्हें सहारा
सारा जीवन मेहका देंगी
तुम पे लुटा स्नेह वो सारा

दुर्गा की शक्ति भी इनमें
मीरा की भक्ति भी इनमें
संस्कृति की पहचान नारी से
देश का सम्मान नारी से

#मन घुमक्कड़