बेटी…

मुझको जीवन देने वाली, मेरी प्यारी माँ

तेरी आँखों से देखा, मैंने सारा जहाँ

अपने आँचल की छांव में, तुमने मुझे है पाला

हर मुश्किल घड़ी में तुमने, मुझको हैं संभाल

दुःख अपना छुपा कर तुम, खुशियां मुझे दे देती

हर जीवन मे बनना चाहूं, मैं तेरी ही बेटी……

#मन घुमक्कड़

सुकून कैसे मिले…

हम बैठे है घरों में सुकून से….
हमें बस इल्तज़ा इतनी की बीमारी से सुकून मिले
जिनकी गरीबी ही बीमारी बन गयी, पूछो उनसे की भाई तुम क्यू चले।
कही छोटा बच्चा हाथों में, कहीं चल रही जच्चा रातो में,
कही भूख से कदम किसी के रुके, और कही तो दम किसी के रुके,
फिर पूछो की भाई तुम क्यू चले
हमें तो बस इल्तज़ा इतनी की बीमारी से सुकून मिले
कोई खाना लेकर पहुचा है, किसी ने राशन दान किये
पर स्मृति ले लेकर सबने उनका भिखारी सा मान किये
ये मजबूरी है उसकी वरना, वह भी स्वाभिमान से थे पले
हमें बस इल्तज़ा इतनी की बीमारी से सुकून मिले
कहीं पर बसे भी दौड़ी है, कही स्पेशल प्लेन उड़ाए है
पर अब भी सड़को पर यह कौन जो पैदल चलते जाए है
पैसे वालो को तवज्जों, यहाँ सबसे पहले है मिले
हमें बस इल्तज़ा इतनी की बीमारी से सुकून मिले
हमें बस इल्तज़ा इतनी की बीमारी से सुकून मिले….
#मन घुमक्कड़

प्यार की जीत…

शहर की पुरानी मंडी में,जब दो नज़रों का मिलन हुआ
एक हलचल के साथ, यू लगा किसी ने दिल को छुआ
बहुत हुए उदास वो दिल, फिर वहां से बिछड़ जाने से
बस दुआ वो करते की मिल जाये, फिर एक बार बहाने से
फिर एक दिन उस आशिक को, उसका पता मिल जाता है
अब वह दीदार की ख़ातिर, उसकी गलियों में जाता है
तेज तेज पहियों से उसकी, गाड़ी वहा पहुचती थी
घर से कुछ दूरी पर अक्सर, एकस्कूटर रोज बिगड़ती थी
ये सब होता था उसके, बस एक दीदार को।
कभी कभी तो लग जाते थे, घंटो इंतजार को
वह सुंदर चेहरा अपने घर से, अचानक बाहर आता था
फिर उस आशिक का दिल,उसे देख देख खिल जाता था
न करता कोई भी इशारे, पर आंखे सब कुछ कहती थी
वह भी कपड़ो के बहाने, कुछ देर छत पे रहती थी
एकाएक वह नज़रे कभी तो, अलग अलग हो जाती थी
फिर वही नज़रे घूम घूम के, एक दूजे पे टिक जाती थी
यू होते होते अब दोनो दिल, एकदूजे के करीब आये थे
अब एक पल भी न दिखे कोई, तो दिल उनका बैठा जाए थे
न जाने किस तरह, अब एक नाता उनका बन गया
न बात की न कभी मिले, फिर कैसे रिश्ता बन गया
फिर बातें खतों से खूब हुई, और रिश्ता उनका मजबूत हुआ
एक डोर से बंधे रहने को, वो करते रहते रोज दुआ
क़ाबिल खुद को करने को,आशिक ने उसको वचन दिए
और प्रियसी ने भी इंतजार में, उसके सुबह शाम किए
वह दोनो मंजिल पाने को, पूरी शिद्दत लगाते थे
एक बाहर लोगो की सुनता था, एक को घरवाले सुनाते थे
अपने प्यार की ख़ातिर उसने, मेहनत के झंडे लगाए थे
जैसे भीषण युद्ध जीतकर योद्धा, अपने घर को आये थे
हर दुख दर्द में प्रियसी, खून का घूट पीती रही
एक दिन आएंगे वह लेने, यही सोच वह जीती रही
फिर अधिकारी बन एक दिन, आशिक प्रियसी के घर गया
प्रियसी की आँखों मे मानो, खुशी का समंदर भर गया
वह आया उसका हाथ मांगने, बोला यह मेरी प्रीत है
मैं कुछ भी न कर पाता प्रियसी, यह अपने प्यार की जीत है

#मन घुमक्कड़

बेटे का फ़ोन

जब भी बजती घंटी फ़ोन की वह झट से फ़ोन उठती

परदेश से याद किया बेटे ने यह सोच खुश हो जाती

बेटे के लफ्ज़ो के लहज़े माँ झट से पहचान जाती

कम बोले बेटा तब भी उसकी तबियत भाप जाती

न परेशान हो बेटा मेरा इसलिए सब अच्छा है कहती

बच्चों की खुशी के कारण माँ दर्द अपना सहती रहती

क्यू न बेटे भी अब उन माँओ की तरह ही बन जाते

माँ के कुछ न कहने पर भी उसका दर्द पहचान पाते….

#मन घुमक्कड़

माँ

कितना भी पढ़ लिख लो तुम यारो,
ये बस काबिल होने का किस्सा है।
जो सीख मिली माँ से हमको,
वह ही जीवन का हिस्सा है।।