नक़ाब…

जाने कितने ही चेहरे हैं सियासत में एक चेहरे के पीछे
और नसीहतें यह की नक़ाबो में पहचान नही होती……

#मन घुमक्कड़

महफ़िल…

महफ़िल में थे कई लोग मग़र दिल में नही थे
जो दिल में थे वही हमारी महफ़िल में नही थे

#मन घुमक्कड़

मोहब्बत का तराना….

महफ़िल में मोहब्बत का तराना गुनगुनाया
फिर एक चेहरे में चेहरा पुराना याद आया

जो कभी मुक़म्मल न हो सकी उस कहानी सी
रोज सुनकर न रही यादे भी पुरानी सी
हर शाम दिन के ढलते पंजों की थपकियों के साथ
हमे फिर उसका वो गुनगुनाना याद आया

रोज अपने दिल को हम है समझाते
तेरी बेवफ़ाई के बहाने उसको बतलाते
पर तुम बेवफ़ा नही हो यह जानते थे हम
फिर तेरा वादा करके न आना याद आया

न कोई ख़्वाहिश में हम बेकरार हुए
जब भी मिले रिश्तों में फासला सा रखा
जहाँ भी रहो आबाद रहो इल्तिज़ा यही रब से
जब कभी दुआ में मुझे तू याद आया

अबके नज़र भी आये तो नज़रांदाज करना
अब हमको भी नज़रों में बैठा रखता है कोई
इस से पहले की भटक जाते ईमान से हम भी
हमें भी अपना बार-ए-ख़ुदाया याद आया

मेरे लिए अपना सब छोड़ बैठा कोई
थे उसके भी अरमान फिर भी ख़ुदको है समेटा कोई
नज़र हटा जब करने लगे उस हमसफ़र को याद
तब उस शक़्स में ही हमे ख़ुदाया याद आया

फिर महफ़िल में मोहब्बत का तराना गुनगुनाया
फिर एक चेहरे में चेहरा पुराना याद आया…..

#मन घुमक्कड़

“गुरु” एक मार्गदर्शक

गर न होते तुम तो न वजूद मेरा होता
न ये नाम ये शोहरत
न एहतराम मेरा होता


मंजिल पे मुझे पहुँचाकर कहीं दूर
चल दिये तुम तो
अब न दुआ तेरी होती न सलाम मेरा होता


जब भी था रुका तो पीछे खड़े तुमको पाया
तुम दिखो इसलिए बार बार मुड़ता हूँ
पर अब दूर तलक कहीं न नामों निशान तेरा होता


हरदम लख़्त-ए-जिगर सा समझा तुमने
सोचा कुछ हक़ अदा मैं भी कर पाऊँ 
पर तेरा कोई ठौर ठिकाना या वाकिफ़ तो मिला होता


बन के मददगार मुझे क़ाबिल करने
तुम हर दम मसरूफ़ रहते थे 
अब मसरूफ़ हम भी है पर उसमें कोई शागिर्द नही होता


मुझको यक़ीन है जानें से पहले
तुमने जरूर पुकारा होगा
कैसे मैं सुन न पाया ऐसा तो कोई शागिर्द नहीं होता


करके कुछ कर्म गुरु सा बन पाएं
उनसे जो मिला वो औरों को दे जाएं
यहीं गुरुदक्षिणा उसकी क्योंकि गुरु का कोई मोल नही होता


#मन घुमक्कड़

विरह…

देख क्षितिज को मैं सोचूँ
जाने तुम कब आओगे
धरती और गगन के जैसे
मुझसे फिर मिल जाओगे
जाने तुम कब आओगे

ये बारिश की रिमझिम बूंदे
सावन के गीत सुनाती है
सालों जैसे दिन कटते हैं
और रातें मुझें जगाती है
इन बिरहा की घड़ियों को
तुम आकर कब मिटाओगे
जाने तुम कब आओगे

इस मौसम में हरियाली ही
चहुँ ओर दिखाई देती है
मोर और कोयल की प्यारी
बोली भी सुनाई देती है
सूखे तन्हा मेरे मन को
कब हरा तुम कर जाओगे
जाने तुम कब आओगे

इन बारिश की बूंदों में
आँसु को छुपा लेती हूं मैं
कोई पूछे हाल मेरा तो
हँस के दिखा देती हूं मैं
कब आकर अब तुम मेरा
ये हँसना सही बनाओगे
जाने तुम कब आओगे

इस मौसम का इंद्राधनुष
मुझे तेरी याद दिलाता है
दिया हुआ तुम्हारा छाता
कोने में धूल खाता है
इंद्रधनुष के जैसे ही तुम
कब प्यार के रंग दिखाओगे
जाने तुम कब आओगे

रोजरोज की दौड़ धूप में
कभी हड़बड़ा सी जाती हूँ
तुमने दी थी सीख वह
फिर ख़ुद को याद कराती हूँ
बन सहारा मेरा तुम कब
आकर मुझे समझाओगे
जाने तुम कब आओगे

जब से तुम गए परदेश
जैसे कुछ अब रहा न शेष
ख़ुद को ढांढस दिया बहुत
अब नही रख सकती गृहलक्ष्मी का वेश
तुम वापस आकर कब अपना भी
पति व्रत निभाओगे
जाने तुम कब आओगे

भीड़ से गुज़रते हुए अक़्सर
कुछ नज़रे पीछे आती हैं
जब साथ मेरे तुम होते हो
कोई नज़र नही उठ पाती हैं
फिर हाथ थामकर तुम मेरा
उन नजरों को कब झुकाओगे
जाने तुम कब आओगे
जाने तुम कब आओगे….

#मन घुमक्कड़