प्रिये….

मेरा तन मन तुझको अर्पण
तू मन से क्यूँ न साथ प्रिये

मैं सारे रिश्ते छोड़ के आयी
हाथ मे नही तेरा हाथ प्रिये
मेरा तन मन तुझको अर्पण
तू मन से क्यूँ न साथ प्रिये

हुआ सूखा निर्जल सा जीवन
सदा आँखों में बरसात प्रिये
मेरा तन मन तुझको अर्पण
तू मन से क्यूँ न साथ प्रिये

चाहूं हर पल तुझ संग जीना
तू बाँटे बस क्यूँ रात प्रिये
मेरा तन मन तुझको अर्पण
तू मन से क्यूँ न साथ प्रिये

तेरे लिए मैं श्रृंगार करू
तू देखे न एक बार प्रिये
मेरा तन मन तुझको अर्पण
तू मन से क्यूँ न साथ प्रिये

मैं बाबुल की चिड़िया थी चंचल
अब पिंजरा चारदीवार प्रिये
मेरा तन मन तुझको अर्पण
तू मन से क्यूँ न साथ प्रिये

मेरे मन की उत्कंठा का
तुम्हे न होता ज्ञान प्रिये
मेरा तन मन तुझको अर्पण
तू मन से क्यूँ न साथ प्रिये

मैने भी चाहा था नाम करु
अब तुम ही मेरे अरमान प्रिये
मेरा तन मन तुझको अर्पण
तू मन से क्यूँ न साथ प्रिये

सारी इच्छाओं को मार दिया
तेरी बातों का रखती मान प्रिये
मेरा तन मन तुझको अर्पण
तू मन से क्यूँ न साथ प्रिये

न धन दौलत तुमसे चाहूँ
बस दे दो प्यार सम्मान प्रिये
मेरा तन मन तुझको अर्पण
तू मन से क्यूँ न साथ प्रिये

#मन घुमक्कड़

Published by: Yogesh D

An engineer, mgr by profession, emotional, short story/Poem writer, thinker. My view of Life "Relationships have a lot of meaning in life, so keep all these relationships strong with your love"

18 Comments

18 thoughts on “प्रिये….”

      1. I want to tell you “thank you”, but that doesn’t seem like enough. Words don’t seem enough – your comments give inspiration to write well. It means a lot to me! thank you very much ma’am🙏🙏🌻

        Liked by 1 person

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