बचपन…

न ऊँच नीच न जात पात,
न धर्मो का बंटवारा था
वो बचपन कितना प्यारा था

प्यार और सत्कार बहुत था
न बेईमानी के फेरे थे
पूरा परिवार साथ मे रहता
मैं अम्मा का दुलारा था
वो बचपन कितना प्यारा था

न पैसा पास में होता
न होते बड़े खिलौने थे
सब दौलत अपनी यार ही थे,
न उनके बिना गुजारा था
वो बचपन कितना प्यारा था

थे छोटे पर दिल के सच्चे
मन मे बैर न रखते थे
सुबह शाम बस साथ में होते
बिन यारो न काम हमारा था
वो बचपन कितना प्यारा था

कहानियाँ सुनके सोना
तारों की गिनती हम करते
सपनो में खुला रहता अपने
जादू का कोई पिटारा था
वो बचपन कितना प्यारा था

माँ की डाँट में था प्यार छुपा
पिता नजरों से डरा सकते थे
उंगली पकड़ उनकी हम सीखे
उनसे कितना सहारा था
वो बचपन कितना प्यारा था

न ऊँच नीच न जात पात,
न धर्मो का बंटवारा था
वो बचपन कितना प्यारा था
वो बचपन कितना प्यारा था……

#मन घुमक्कड़

Published by: Yogesh D

An engineer, mgr by profession, emotional, short story/Poem writer, thinker. My view of Life "Relationships have a lot of meaning in life, so keep all these relationships strong with your love"

13 Comments

13 thoughts on “बचपन…”

  1. Pahli hi panktiyon se pathak ko bandhe rakhne wali ek behtarin rachna…….
    न ऊँच नीच न जात पात,
    न धर्मो का बंटवारा था
    वो बचपन कितना प्यारा था

    Liked by 1 person

      1. Absolutely right! I also feel that, we do not want to remember bitter experiences not only of childhood but also of life, because we do not want to be sad by remembering them. But this bitter experience also strengthens us for the realities of life. Thanks a lot ma’am 🙏🙏🌹

        Liked by 1 person

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