वीरांगना रानी दुर्गावती…

दुर्गाष्टमी के दिन थी जन्मी
इसलिए “दुर्गावती” कहलाई
माँ शक्ति के नाम स्वरूप ही
उन्होंने थी वीरता पाई

एकलौती संतान पिता की
वह साहसी थी रानी
रण कौशल शौर्य के आगे
दुश्मन भरते पानी

बंदूक तीर भाले में उनकी
निपुणता बड़ी निराली
शिकार चीते का करती
वह रानी साहसवाली

उनकी शौर्य वीरता और
सुंदरता का चर्चा खूब हुआ
फिर राजा दलपतशासंग
रानी का विवाह एक रोज हुआ

अपने पति धर्म के साथ वह
रानी धर्म भी निभाती
पति बच्चे के साथ
राजा की ताक़त बनते जाती

असमय पति के जाने से
मानो विष का प्याला डाल लिया
बच्चे को बैठा गद्दी पर
गढ़मंडला का शासन संभाल लिया

अपने शासन काल में राज्य की
खूब उन्नति करवाई
नए नए निर्माण कराकर
गोंडवाना की पताका लहराई

देख सुखी सम्पन्न राज्य
मुगलों ने सोचा हथियाएं
कई दफ़ा आक्रमण किये
पर हरदम मुँह की वो खायें

उनकी शौर्य और सुंदरता के
चर्चे अकबर ने थे खूब सुने
इसलिए राज्य को हथियाने
फिर उसने षड्यंत्र बुने

उनके प्रिय श्वेत हाथी सरवन
और विश्वस्त मंत्री आधार को
अकबर ने भेंट में मांगा
नही तो कहा युद्ध यलगार हो

अकबर के प्रस्ताव को रानी ने
सिरे से नकार दिया
और युद्ध मे आसफ़ खां के
मंसूबों को परास्त किया

फिर से दोगुनी सेना संग मुगलों
ने आक्रमण की ठानी
वीरता से तो लड़ी वह
पर सेना की हुई थी हानि

पुत्र छिपाकर युद्ध में रानी
ने मुगलों का संहार किया
पर तीर मारकर चुपके से
दुश्मन ने आखों में वार किया

अंत समय में भी दुर्गावती
किसी मुग़ल के हाथ न आई
ख़ुद को मार कटार
वह वीरांगना कहलाई …..

#मन घुमक्कड़