यारों का साथ….

बचपन के स्कूल वो प्यारे
वो मैदानों में दौड़ लगाना
इतने प्रफुल्लित रहते थे तब
जो साथ में थे वो यार ही थे

जब हल्की हल्की मूछे आयी
आवाज़ हमारी थी भर्राई
तब भी बातें सांझा करने
जो साथ में थे वो यार ही थे

एक उम्र जब दिल की धड़कन
देख किसी को सरपट दौड़े
उस वक्त हमे सलाह देने
जो साथ में थे वो यार ही थे

पास हुए स्कूल छूट गया
फिर कॉलेजों के दौर हुए
नई पढ़ाई नई जगह में
जो साथ में थे वो यार ही थे

होस्टल की वो मस्ती जब सब
रात में हुड़दंग करते थे
होली शू पॉलिस टूथपेस्ट से खेलने
जो साथ में थे वो यार ही थे

कुछ बेअकलों की बातों में
हम उनसे जब दो चार हुए
तब उनको सबक सिखाने को
जो साथ में थे वो यार ही थे

मेहनत से जी जान लगाकर
जब हम सब डिग्री पाए
इस खुशी में रंग जमाने
जो साथ में थे वो यार ही थे

नौकरी की अभिलाषा ने हमको
दर दर खूब भटकाया
तब मंदिरों में दुआ मांगने
जो साथ में थे वो यार ही थे

चयनित हुए नौकरी लगी
फिर नया वक्त सबका आया
इस खुशी को दिल से जीने
जो साथ में थे वो यार ही थे

जीवन मे हमसफर मिला गया
गठबंधन में था यार जब बँधा
शादी में पूरी रात नाचने
जो साथ में थे वो यार ही थे

जीवन के हर सुख दुःख में
हाथ कंधे पर रखकर
चेहरे पर मुस्कान लिए
जो साथ में थे वो यार ही थे

मुश्किल घड़ी में जब यारों का
कोई संदेशा मिल जाता
तब उसके पास पहुँचने
जो साथ में थे वो यार ही थे

सब जीवन मे मसगूल हुए
अब मिलना मुश्किल हो चुका
फ़ोन पे भी कहने सुनने
जो साथ में थे वो यार ही थे

माना जीवन की राहों में
अब मिलना मुश्किल हो चला
एक कोशिश करके फिर कहतें है
ये जो साथ में हैं वो यार ही हैं

#मन घुमक्कड़

11 Replies to “यारों का साथ….”

  1. बहुत ही खूबसूरत कविता।

    जब जब मन विचलित होता है,
    जीवन के जिस मोड़ पर,
    तब तब यार नजर आता है,
    जीवन के उस मोड़ पर।

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